अन्ध-बिन्दु - शक्ति और क्षमा 2.0
- jalansaab
- Sep 1, 2023
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Updated: Dec 23, 2024

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भाग १
कविता का पहला भाग राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की अनुपम रचना 'शक्ति और क्षमा' का संकेतक है व उसके संदेश को दोहराता व सुदृढ़ करता है।
शिशुकाल में हुई भिड़ंत जो दुर्लभ एक रचना से।
घोर प्रहार मनोभूमि पर त्वरित हुआ सहसा से॥
यह कौन रचयता स्वर-पुष्पों से कर सकता विस्फोट।
ध्वनि मृदुल कर्णों पर किंतु मर्म हृदय पर चोट॥
कौन हठी हो निडर करे यह दुस्साहसिक उद्घोषण।
अहिंसा की आँधी के मध्य धर्महिंसा उद्दीपन ॥
दिनकर को उपनाम बनाकर राव कौन यह करता।
शमित चित्त आंदोलित कर यह कौन मनःसुख हरता॥
शक्ति और क्षमा का नाता गूंजा शब्द-स्वरों से।
तिमिर भेदती ज्ञानरश्मियाँ यथा-नाम अधरों से॥
सर्वप्रथम करते प्रभावित भीष्म नरपुङ्गव को।
सूयोधन-तुमसे-कब-हारा कह उकसाते पाण्डव को॥
तत्पश्चात कविवर ने क्या काव्यशक्ति दर्शायी।
कायरता व तमस जनित सब प्रतिरोध भूशायी॥
बल जिसका हो गोचर पहने क्रोध मुकुट सा सिर पर।
परहानि की क्षमता जिसमें हो परक्षति को तत्पर॥
वही प्रशस्ति के समर्थ वही लोकादर अधिकारी।
अपयश ही पर लिखवा लाया हेय तामस अनुचारी॥
व्यावहारिक सिद्धांत को करने धर्माधार प्रदान।
मानस से एक प्रसंग जुटा किया राघव का आह्वान॥
दुर्बुद्धि सिंधु को साध हरि ने प्राणभिक्षा दी।
भय बिन प्रीत नहीं है संभव उचित धर्म-शिक्षा दी॥
सहनशीलता क्षमा दया आदि गुण मिथ्या-भर हैं।
स्वास्तित्व हेतु भी सदैव जो बाहुबल पर निर्भर हैं॥
शीतल कोमल ज्योत्सना मुनिचित्त को स्पंदित करती।
दुग्धधुली धरती के कण-कण त्रिविध मधुरता भरती॥
पर चंद्रशीत के पृष्ठभाग भानु का ताप छुपा है।
कोमल इन्दुरश्मि दल सौर प्राचण्ड्य से पनपा है॥
कारण अनुपलब्ध तो फिर हो फल भी अपेक्षित क्यों।
बल-विहीन उदारभाव सम व्योमपुष्प है त्यों ॥
कूट कूट कर दिनकर ने हमको यह मन्त्र सिखाया।
धर्मपुत्रों को चिरकाल की इस तम-मूर्छा से जगाया॥
ढेरों धन्यवचन संग हम कविवर को शीश झुकाते ।
बात पूर्व की अब समाप्त हैं अग्रिम विषय पर आते ॥
भाग २
कविता का द्वितीय भाग 'शक्ति और क्षमा' सिद्धांत के एक सूक्ष्म व जटिल - किंतु अतिमहत्त्वपूर्ण - भेद को उजागर करता है जो कि बहुधा अनदेखा रह जाता है।
क्षमा-शक्ति सिद्धांत में हाय एक सूक्ष्म भेद धुँधलाया।
हे धर्मभ्रातृ अपने उत्तेजन में धर्मकुसुम मुरझाया॥
माना परहानि हिंसा भी कभी धर्माश्रित है।
विनय का चोगा ओढ़े कायरता अवश्य निंदित है॥
स्मृत रहे किंतु कि औदार्य ही नित्य सहज नियम है।
जिसका केवल अपवादमात्र ही हिंसामार्ग विषम है ॥
प्रथम की सत्ता व्यापक है है चहुँ-ओर सत्कार।
दूजे की संकीर्ण परिधि दुर्लभ धर्माचार॥
सोचो क्रम जब राघव सागरछोर खड़े थे चिंतित।
ये शत योजन दौर्य सिया से रखता मुझको वंचित॥
किस प्रकार जाए साधा यह जलधि विस्तृत भीषण।
विनय विकल्प उचित राजन प्रस्तुत मत करते विभीषण॥
विलंब शेष अभी व्याकुल राघव दग्ध विरह अग्नि में।
पुनः उत्साह जुटा तथास्तु बोले मंद ध्वनि में॥
साधु साधु का स्वर उमड़ा थे करते सर्व बड़ाई।
रामानुज को किंतु राम की युक्ति रास ना आई॥
अहो प्रिय अग्रज यह क्या निर्णय लिया विवेकविमुख।
क्या कर सकती कायरता प्रतिस्थापित शौर्यसुख॥
पौरुष छोड़ क्या भगीरथवंशज भिक्षावृत्ति धरेगा।
त्याग धनुष करकमल राम का क्या वीणा पकड़ेगा॥
कोप जगाओ विशिख उठाओ क्या रक्खा भजनों में।
अवसर ये धाक दिखाने का इन अतिप्रतिकूल क्षणों में॥
हरि मुस्काये देख लखन की न्यारी बाल ढिठाई।
सहसा कृष्ण गगन में ज्यों कोई तारिका टिमटिमाई॥
स्वतः पुरुषोत्तम के स्वर फूटे करो मन वश में प्रियवर।
होगा यही हुई आवश्यकता तो किंतु उचित घड़ी पर॥
दो ध्यान मित्र है भेद दोनों रघुपुत्रों के बीच यहीं।
सत्त्व रजोगुण मध्य भी कहीं यही अंतर तो नहीं॥
दोनों जानते भली भाँति भय-प्रीत सूत्र महान।
पर एक स्वच्छन्द तो दूजा अपने पग बाँधे धर्मविधान॥
लखन-प्रवृत्ति करे खड़ा हमें रावण दल में लाके।
लंकेश ने भी सुन राम-मत बहुरूप कसे थे ठहाके॥
स्वेच्छाचार जनित अहं से मानव-दोषों से प्रेरित।
मर्यादा परे विकार से रखे अहं मुष्टि-बंधित॥
प्रथम सरल है सहज भी पर अंत इसका है क्रूर।
द्वितीय माँगे त्याग संयम किंतु दे सुख भरपूर॥
वह तीन दिवस विनय-अनुनय के धर्म-अधर्म सीमांकन।
किस ओर स्थित रेखा के तुम स्वयं करो अभिचिन्तन॥
सामयिक कर्म जो पुण्य है वही असमय घोर है पाप।
शक्ति नियंत्रित वर है तो अमर्यादित है अभिशाप॥
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