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पीपळी

  • Writer: jalansaab
    jalansaab
  • Jan 23
  • 5 min read

Image Credit: Rene Rauchenberger from Pixabay
Image Credit: Rene Rauchenberger from Pixabay



Peepli, a Marwadi folk song, is amongst the most heart-rending songs ever - it is an intense विरह गीत, song of separation. Owing to a combination of colonial apathy, its extreme climate and natural water scarcity, Rajasthan lacked business and commerce and the young men of the house would often have to leave for jobs to the eastern Indian provinces, leading to marital separation, sometimes extending to many years.


In this folk song, a young bride helplessly laments the separation from her husband and in a bid to provoke him to return, reminds him of the small Peepal sapling - a Peepli - that he had sown before leaving, which has now grown into a full-blown tree, metaphorical of her own self, who had come as a child bride and has now turned into a young woman.



पीपळी

मारवाड़ी लोक गीत



बाय चाल्या छा भंवर जी पीपळी जी

हांजी ढोला हो गई घेर घुमेर

बैठण की रुत चाल्या चाकरीजी

ओजी म्हारी सास सपूती रा पूत

मत ना सिधारो पुरब की चाकरी जी…


आपने जो नन्ही सी पीपली बोई थी, हे प्रियतम, वो विशाल व घना वृक्ष बन चला है। अब जब [उसकी छाँव में] बैठने का समय आया तब आप नौकरी पर चले गये हैं। हे मेरी सपूती सासू के पुत्र! आप पूर्व (परदेश) की नौकरी पे मत जाइए!



परण चाल्या छा भंवर जी गोरड़ी़ जी

हांजी ढोला हो गई जोध जवान

बिलसण की रुत चाल्या चाकरी जी

ओ जी म्हारी लाल नणद बाई रा बीर

मत ना सिधारो पुरब की चाकरी जी...


जिस गौरी को आप ब्याह लाए थे, हे प्रियतम, वो अब बड़ी और जवान हो चली है। जब विलास का समय आया तो आप नौकरी पर चले गये हैं। हे मेरी लाड़ली ननद-बाई के भाई! आप पूर्व (परदेश) की नौकरी पे मत जाइए!



कुण थारा घुड़ला भँवर जी कस दिया जी

हाँजी ढोला कुण थानै कस दीनी जीन

कुण्यजीरा हुकमा चाल्या चाकरी जी

ओजी म्हारे हिवड़ा रा नौसर हार

मत ना सिधारो पुरब की चाकरी जी...


हे प्रियतम, ये आपके घुड़ले किसने कस दिए? और ये आपको जीन किसने कसके दे दी? किसकी आज्ञा से आप अपनी चाकरी पर चल पड़े हैं? हे मेरे हृदय के नौसर हार! आप पूर्व (परदेश) की नौकरी पे मत जाइए!



रोक रुपैया भंवर जी मैं बणूं जी

हां जी ढोला बण ज्याऊं पीळी पीळी म्होर

भीड़ पड़ै जद सायबा बरत ल्योजी

ओजी म्हारी सेजां रा सिणगार

पिया की पियारी ने साग्गै ले चलो जी...


आपको रोकने के लिए मैं रुपया बन जाती हूँ (जिससे कि आपको धन के लिए परदेश जाने की आवश्यकता ही ना पड़े।) [अथवा] हे प्रियतम, मैं पीली (सोने की) मुहर ही बन जाती हूँ! जब आवश्यकता पड़े तो हे स्वामी आप मुझे उपयोग कर लेना। ओ मेरी सेजों के शृंगार! आप पूर्व (परदेश) की नौकरी पे मत जाइए!



कदेई नां ल्याया भंवर जी चूनड़ी जी

हां जी ढोला कदेई ना करी मनव्हार

कदेई नां पूछी मनड़ै री वारता जी

हां जी म्हारी लाल नणद रा बीर

थां बिन गोरी नै पलक ना आवड़ै जी…


आप मेरे लिए न कभी चुनरी ही लाए और न ही, हे प्रियतम, मेरी कोई मनुहार ही कभी करी। आपने कभी मेरे मन की बात तक भी नहीं पूछी। हे मेरी लाड़ली ननद के भाई! आपके वियोग में आपकी गौरी का पलक-भर (क्षण-भर) भी मन नहीं लगता!



बाब्बोसा नै च्याए भंवर जी धन घणों जी

हां जी ढोला कपड़े री लोब्भण थारी माय

सेजां री लोभण उडीकै गोरड़ी जी

हां जी थारी गोरी उड़ावै काळा काग

अब घर आओ धाई थारी नौकरी जी...


पिताजी (ससुरजी) को तो बहुत अधिक धन चाहिए है और, हे प्रियतम, आपकी माँ तो कपड़ों की लोभिन हैं (इसी लालच से आपको परदेश नौकरी पर भेजने के लिए तत्पर रहते हैं!) सेजों की लोभिन गौरी आपकी प्रतीक्षा करती, काले काग उड़ाती है (आपकी प्रतीक्षा में समय व्यर्थ करती है।) अब लौट कर घर आ जाइए, आपकी चाकरी से मैं तंग आ गयी हूँ!



चरखो तो लेल्यो भंवर जी रांगलो जी

हां जी ढोला पीढ़ो लाल गुलाल

मैं कातूं थे बैठ्या बिणजल्यो जी

ओजी म्हारी लाल नणद रा बीर

घर आओ प्यारी ने पलक ना आवड़ै जी...


आप एक सुंदर रंगीला चरखा ले लीजिए और, हे प्रियतम, आप एक लाल-गुलाबी पीढ़ा भी ले लीजिए। मैं [सूत] कात लूँगी और आप उसको बुन लीजिएगा (और इस प्रकार हम यहीं पर ही कपड़े का व्यापार कर लेंगे; आपको परदेश जाने की आवश्यकता नहीं रहेगी।) हे मेरी लाड़ली ननद के भाई! आप घर आ जाइए! आपकी प्यारी का पलक-भर (क्षण-भर) भी मन नहीं लगता!



सावण सुरंगों लाग्यो भादवो जी

हां जी कोई रिमझिम पड़ै है फुहार

तीज तिंवारा घर नहीं बावड़्या जी

ओजी म्हारा घणा कमाऊ उमराव

थारी पियारी नै पलक ना आवड़ै जी...


सुंदर सावन लग चुका है। भाद्र भी लग चुका है। देखो कैसे बारिश की रिमझिम फुहार पड़ रही है। तीज-त्योहारों पर (शुभ अवसरों पर) भी आप घर नहीं आए। हे मेरे बहुत कमाने वाले पातिदेव, आपकी प्यारी का पलक-भर (क्षण-भर) भी मन नहीं लगता!



फिर घिर महिना भंवर जी आयग्या जी

हाँ जी ढोला हो गया बारा मास

थारी धण महला भंवर जी झुर रही जी

हाँ जी म्हारे चुड़ले रा सिणगार

आच्छा पधारया पुरब की नौकरी जी...


घूम-फिर कर वही महीने फिर लौट आए हैं (अर्थात एक वर्ष पूर्ण हो गया है)! हे प्रियतम, बारह मास बीत चुके हैं! आपकी पत्नी आपके विरह में विलाप करती है, निरंतर दुखी रहती है। हे मेरे चूडले के शृंगार (क्योंकि मेरी चूड़ियों की शोभा आपसे ही है)! भले गये आप पूर्व (परदेश) की चाकरी!



उजड़ खेड़ा भंवर जी फिर बसे जी

हाँ जी ढोला निरधन रै धन होय

जोबन गयां पीछे नांही बावड़े जी

ओजी थाने लिख हारी बारम्बार

जल्दी घर आओ थारी धण एकली जी…


उजड़ा हुआ खेत भले ही पुनः हरा-भरा हो सकता है। हे प्रियतम, निर्धन के पास भी धन भविष्य में आ सकता है। [परंतु] बीता यौवन दुबारा लौट कर नहीं आता है। मैं आपको बार बार बोल कर हार चुकी हूँ! अब शीघ्र घर लौट आइए, आपकी प्रिया अकेली है।



जोबन सदा नां भंवर जी थिर रवे जी

हाँ जी ढोला फिरती घिरती छाँव

कुळ का तो बाया मोती नीपजे जी

ओ जी थारी प्यारी जोवै बाट

जल्दी पधारो गोरी रे देस में जी…


यौवन सदैव स्थिर नहीं रहता है (बीत जाता है।) यह तो केवल छाया के जैसा है जो आकर शीघ्र ही चला जाता है। किसिके बोये हुए मोती भी कभी पैदा होते हैं? आपकी प्यारी अधीर हो आपकी प्रतीक्षा करती है। अब अविलंब ही गौरी के देश चले आओ!



बाय चाल्या छा भंवर जी पीपळी जी

हां जी ढोला हो गई घेर घुमेर

बैठण की रूत चाल्या चाकरीजी

ओजी म्हारी सास सपूती रा पूत

मत ना सिधारो पुरब की चाकरी जी...


आपने जो नन्ही सी पीपली (पीपल का छोटा पौधा) बोई थी, हे प्रियतम, वो विशाल व घना वृक्ष बन चला है। अब जब [उसकी छाँव में] बैठने का समय आया तब आप नौकरी पर चले गये हैं। हे मेरी सपूती सासू के पुत्र! आप पूर्व (परदेश) की नौकरी पे मत जाइए!



 
 
 

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